घुसपैठ करना सीखा है
अब इंसानो के मकानो मे।
सपने भी खुब सजाये हैं
घोसले बना रौशनदानों मे।
ये नीड़ नही ये खेल है
हम पंछियों का मेल है।
वो खिलाते रहे हम खातेे रहे
हम सिखाते गये बच्चे उडाते गये।
हमने भी चहचहाना और
बढाया है
घरवालों को रोज जगाया है।
फागुन चैत्र कब छोड गये अब
आया झुलसाता जेठ महिना।
बिजली के इन पंखो से अब
घरवाले सुखाये खुब पसीना।
मौत ने ऐसी दस्तक दी पर
फूदकने की अदा नही है छोडी।
स्वछंद उडने की आदत पर रुठे
पंखे ने हमसब की गर्दन तोडी।
हम पंखो की इस बाजी मे
बिजली पंखा से हार गये।
सहचर बने इंसानो का इस चाहत को
क्यूं जीते जी तुम मार गये।
सुनिल दूबे "कैमूरी"
अब इंसानो के मकानो मे।
सपने भी खुब सजाये हैं
घोसले बना रौशनदानों मे।
ये नीड़ नही ये खेल है
हम पंछियों का मेल है।
वो खिलाते रहे हम खातेे रहे
हम सिखाते गये बच्चे उडाते गये।
हमने भी चहचहाना और
बढाया है
घरवालों को रोज जगाया है।
फागुन चैत्र कब छोड गये अब
आया झुलसाता जेठ महिना।
बिजली के इन पंखो से अब
घरवाले सुखाये खुब पसीना।
मौत ने ऐसी दस्तक दी पर
फूदकने की अदा नही है छोडी।
स्वछंद उडने की आदत पर रुठे
पंखे ने हमसब की गर्दन तोडी।
हम पंखो की इस बाजी मे
बिजली पंखा से हार गये।
सहचर बने इंसानो का इस चाहत को
क्यूं जीते जी तुम मार गये।
सुनिल दूबे "कैमूरी"
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