Tuesday, 14 August 2018

"संवेदना"

जल रहा है तन मन
नित्य भोर भीनसारा
पसीना लिये ये सुबहें
प्रकृति का है सहारा।

दिन भर उलझा रहा
सांझ की आस लिये
करवटें बदलते रहे
दो नयन खास लिये
जलन है इन आंखो मे
चुभते तारों का नजारा।

पोखर ताल नही रहे
जल बिन तडपे मीन
बिन पानी दाना चुगे
खग बिताये बुरे दिन
संवेदना की अस्थियां
हीं बने ताकत दोबारा ।

जीवन जीना सिख रहे
अब कौवे की बारात से
गायब हैं वो पुरे दिन
बस दिखेंगे बरसात से
पुरुवा बयार नदारद
केसर गंध पुकारा।

फागन चैत्र बेराग हुए
अब जेठ की है ठाट
आषाढ़ ढाहे पहाड़ सडक
पर रोये नाले पकडे खाट
सब जतन कर असहाय
अब प्रतिक्रिया का मारा।

कोयल की कुहू कुहू
कौवे की कांव कांव
ये ख्वाब मुकम्मल होंगे
बस चलना है छांव छांव
प्रकृति का अंश मात्र जीवन
कब तक करें किनारा।

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