Tuesday, 14 August 2018

सुकून नही अब बातों मे।

सुकून नही अब बातों में
आजादी के जज्बातों मे।

निखरे हैं गलियों की रंजिश
सुलग रहे नफरत की ज्वाला
मचल‌ रहे युद्ध डगर डगर पर
सिसक रही पनघट की बाला
लाज बिके खैरातो मे
सुकून नही अब बातों मे।

जले बुझे से मंदिर मस्जिद
इंसान नही कारखाने हैं
लूट रहे हैं अरमानों को
आजाद मगर मयखाने हैं
चीख मची अब रातों मे
सुकून नहीं अब बातों मे।

तरस ऊठे हैं नयन नयन
प्रेम की आस घटे मन की
भाव चढे हैं चौपालों पर
कीमत जान मेरे तन की
जहर मिले सौगातों मे
सुकून नही अब बातों मे।

गम का सहर मिले रातों मे
कहीं नुमाइश फूलों मे
गांठ पडे हैं जात पात की
सियासत के इन झूलों मे
उमर कटे अब घातों मे
सुकून नही अब बातों मे
आजादी के जज्बातों मे।

सुनिल दूबे "कैमूरी"

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