बेटा आज काफी खुश था। हो भी क्युं न!
आज पहली बार उसके पिता ने वो अधिकार दिया जो अब तक नही मिला था।आज वह अपने चंद दोस्तों के साथ पुरी रात बियर बार मे गुजारा।सुबह होते हीं पुलिस थाने मे अर्धसत्य रपट लिखाई।पिता ने तो कभी पुलिस थाने का दर्शन नही किया।लोक लाज का कुछ ख्याल जिंदा था दिल मे।लेकिन संपत्ति बंटवारे को लेकर तीन भाईयों का आपसी बैर परवान चढता गया।अब बडका घराने के इन बेटों ने अपने अपने पिता की इस बैर और हक पाने की उम्मीद को जिंदा रखा थाने मे मुकदमा दर्ज करा कर।तीन पति-पत्नी और सबके बेटे और बेटियाँ अपने अपने खेमे मे चर्चा करते रहते थे आपस मे।इमानदार हक मिलने पर बंटवारे के बाद की अनमोल स्वतंत्रा पर।नये कार्यों और बुलंदियों को छुने वाले साहसिक फैसले लिये जाने की चर्चा मात्र से सबके चेहरे पर विजयी भाव स्पष्ट दिखाई पडते थे।एक हीं आंगन मे पुरा कुनबा लडता झगडता रहता था।पुर्वजों से मिली विरासत मे सैकडो बीघा जमीन हीं वजह थी इतराने और धौंस दिखाने का गांव समाज मे।तीनो भाई अपनी संतानो को अच्छा संस्कार और परवरिश देने की इच्छा रखते थे।आपसी मनमुटाव पैसों की हेराफेरी की शक और छोटी छोटी चीजों पर अपना पराया का तडका लिये बहस और मारपीट, गांव वालों की आखों को सुकुन दे रहा था। जमींदारी खानदान की इज्जत और शोहरत धु-धु कर जल रही थी सरेआम।गांव का घुरहु तिवारी जिसका परिवार कलह का अखाड़ा था अब वो भी गांव के निठल्ले और निकम्मों के साथ हर्षित हो रहा था।जब ये गांव का बडका घराना हीं लड मर रहा दरवाजे पर तो हमारे जैसे बिन पेंदी वालों का तो इतिहास हीं डोमघाउंच करना है।अपनी खानदानी इज्जत की लडाई अब बडका घराना आपस मे हीं लड रहा था।सारे हीत हितैषी हार गये समझौते कराते कराते।पुलिस थाना भी उब गया इन बडका घरानों की दंगल से।कभी फुआ कभी फुफा कभी पाहुन कभी काका कभी मामा, सबके सब बदनाम हुए इस लडाई मे।हर कोई पक्षपाती नजर आता।तीनों भाइयों के ससुराल वालों ने भी ताकत दिखाई और अपने अपने पाहुन को ज्यादा फायदा पहुंचाने की वचनबद्धता दोहराई।दो चार साल परती रही जमीन जो आमदनी का सहारा था।पुलिस थाना भी गदगद था मोटा माल खाकर।कभी बडका कभी मंझला कभी छोटका भाई चढावा दे आते थे, इस उम्मिद पर की उसका पलडा भारी रहे।घर के कुछ निरंकुश खानदानी लडके समय निकालकर अपने गुट के साथ शराब और गांजा पीकर मुड को तरोताजा भी कर रहे थे।अब ये संतान खुद को हीं बडका घराना का जिम्मेवार सिपाही समझते थे।आचरण और चरित्र की परवाह किये बगैर।मै तो हुक्म का गुलाम था सबका।मेरे लिये तीनो भाई मालिक ठहरे।बदनाम हो रहा था ये चरवाहा।कभी बडकी मालकिन ताने मारती,कभी मंझली कभी छुटकी।मुझे किसी एक का हीं कहा मानता हुआ दिखना दुसरे की नजर मे पक्षपाती होना था।लेकिन इस बीच बडका घराना का हवाला देकर गांव के कई परिवार जो बरसों से लड रहे थे आपस मे बंट गये।
कुछ सालों बाद बडका घराना के तीनो पिता और सारे पुत्र मिलबैठ कर मध्यस्थता की बैसाखी पर बैठकर बंट गये।जमीन के टुकडे हुए।अपना कहने के लिये बस पुर्वजों की जमीन हीं थी।सबकुछ बंटा, कहीं चुल्हे कहीं बर्तन कहीं राशन।खास था सबके चेहरे पर एक अनजाना संशय और चिंता का भाव।तीनो भाईयों ने अपना आशियाना बनाया।अपनी जरुरतों को पुरा करने मे लग गये।लेकिन पहली बार हुए इस कलह और छिनाझपटी भरे बंटवारे ने हर संतान के मस्तिष्क को दुषित और मैला कर दिया था। व्यावहारिक और संस्कारिक पक्ष तो विरासत मे मिला नही था।समाजिक बौद्धिक और मानिसिक विकलांगता भी चांटे मार रही थी।आज ये लडके आपस मे हीं लड रहे।१८ साल का सुरेश अपना हिस्सा मांग रहा तो कभी २० साल का नरेश अपने हिस्से की बात कह रहा।उधर सुधा भी गाहे बगाहे तीसरा हिस्सा मांग रही।पिता के हक की लडाई लड विजेता बने अब ये सारे भाई अपने हिस्से की लडाई लड रहे।छिनाझपटी मारपीट का तमाशा सरेआम है।हर बात को अपना पराया,तेरा मेरा का रंग देना खुब सिखा है पिता की लडाई से। बंटवारे के बाद जो चिंता का भाव पिता के चेहरे पर था आज वो अपना रंग दिखा रहा।खाट पर लेटे पिता कोस रहा था अपनी संतानो को।बाप दादा ने अपनी मेहनत से जो कुछ भी छोडा, आज उसी पर महाभारत।
मै उदास था।लुट गया।
कहीं का नही छोडा इस घराने ने।मेरे बाप दादा इनके खेतों मे काम कर हम सबका पेट भरते रहे।पुरा परिवार पलता रहा खुशी खुशी।आज कहां जाऊ।मै चरवाहा हुं पर मेरे बाप दादा ने मुझे शिक्षित किया बुद्धि और संस्कार दिया।अफसोस है इस बडका घराने पर जो सबकुछ पाकर भी आज अशिक्षित पिछडे समाज मे संस्कारहीन जीवन जी रहा।रोजी-रोटी के लिये शहर चला जाउंगा।तु पगली उदास मत हो।अब वहां बडी बडी गाड़ियों वाला मालिक होगा।उसकी गाडी साफ कर पैसे खुब कमाना है।तु ध्यान रख बस बेटे को आदर्श इंसान बनाना है।बस फर्क इतना है पहले चरवाहा था अब नौकर कहलाउंगा।