मन दुनिया के धंधे मे खोया पाया
आंखो मे कुछ ख्वाब की बतियां
दिल पे लेकर बैठा सहज जीवन
दिन गवां ले चिंतन भरी रतियां।
छोटे मन से चहुंओर स्वारथ
ये जीवन खुदगर्ज की शिक्षा
बडे मन कर अंदर को झांका
दिला रहा परमारथ की दीक्षा।
रुक रुक कर अब जश्न मनाऊं
छोटे मन से खुद का करूं उद्धार
कहो बडे मन से अब यू्ँ ना टोके
देखी है दुनिया कह छोटा चला।
छोटे मन ने नष्ट किया ये तन
जो हड्डी मांस की मूर्ति हीं लगे
उलझ सुलझ कर जीवन जीना
अनदेखे ख्वाबों की पूर्ति लगे।
मन का सागर आंखो मे भर
धूप की चादर खींच लिया है
छोटे मन को सूखा-सूखा कर
फिर से जीवन सींच लिया है।
मन हर्षित कुलाचे मारे यौवन
बडे मन से लगी स्नेह की आस
छोटे-बडे मन बस क्षणिक वेदना
रंग बिछावन पर है मन उल्लास।
पावन कर मन चल निकला है
उमंग लिये जीवन की हर शाम
आती है सुबहे रत्नजड़ित अब
निश्छल मन को नहीं विश्राम।
सुनिल दूबे"कैमूरी"
आंखो मे कुछ ख्वाब की बतियां
दिल पे लेकर बैठा सहज जीवन
दिन गवां ले चिंतन भरी रतियां।
छोटे मन से चहुंओर स्वारथ
ये जीवन खुदगर्ज की शिक्षा
बडे मन कर अंदर को झांका
दिला रहा परमारथ की दीक्षा।
रुक रुक कर अब जश्न मनाऊं
छोटे मन से खुद का करूं उद्धार
कहो बडे मन से अब यू्ँ ना टोके
देखी है दुनिया कह छोटा चला।
छोटे मन ने नष्ट किया ये तन
जो हड्डी मांस की मूर्ति हीं लगे
उलझ सुलझ कर जीवन जीना
अनदेखे ख्वाबों की पूर्ति लगे।
मन का सागर आंखो मे भर
धूप की चादर खींच लिया है
छोटे मन को सूखा-सूखा कर
फिर से जीवन सींच लिया है।
मन हर्षित कुलाचे मारे यौवन
बडे मन से लगी स्नेह की आस
छोटे-बडे मन बस क्षणिक वेदना
रंग बिछावन पर है मन उल्लास।
पावन कर मन चल निकला है
उमंग लिये जीवन की हर शाम
आती है सुबहे रत्नजड़ित अब
निश्छल मन को नहीं विश्राम।
सुनिल दूबे"कैमूरी"
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