कहीं धरा आलिंगन करती
धन-धान्य आंगन ढेर लगे
कंकड़ पत्थर अपना सा
कहीं बम गिरे आसमानों से
रक्तरंजित पडी वसुंधरा।
कहीं हलधर,राग-मल्हार
चैत्र राग खलिहानों मे
कहीं विध्वंस,चीत्कार मिले
अब राष्ट्र दहन फरमानो से
लथपथ आंचल,शोक भरा।
न्ई फसल उम्मीदें जगाये
सबकी भूख मिटाने को
कहीं मिले युद्ध सडक पर
क्षत विक्षत शव मैदानों मे
सहमी भूमि का मन मरा।
धरा स्वयं दहकता गोला
ममतामयी बन आश्रय दे
लाखो जीव और बहुतेरे
कांपती रुह इंसानो से
दहक रहा,मन बंजारा।
अधम जग,दानव सा
करे कर्म दुशासन बन
धरा छुपे कभी सागर मे
कभी ज्वाला रुप लिये
अभी कुछ शेष नजारा।
इस सुबह की शाम ढले
उषा की दीप्ति जग फैले
धर्मपथ पर चलना होगा
द्रष्टा अब आंखे खोलो
मिले सबको नया सहारा।
(सुनिल दूबे"कैमूरी")
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