Wednesday, 12 September 2018

कुंडलियाँ,हाइकु,रोला,घनाक्षरी



                    **कुंडलियाँ**
कुण्डलियाँ मात्रिक छंद है। एक दोहा और एक रोला मिला कर कुण्डलियाँ बनती है। दोहे का अंतिम चरण ही रोला का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलियाँ का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलियाँ छंद समाप्त भी होता है।पद की सीमा नहीं।उदाहरण:
१)धीरे धीरे समय ही, भर देता है घाव।
मंजिल पर जा पंहुचती, डगमग होती नाव॥
डगमग होती नाव , अंततः मिले किनारा।
मन की मिटती पीर, टूटती तम की कारा।
'ठकुरेला' कविराय, खुशी के बजें मजीरे।
धीरज रखिये मीत, मिले सब धीरे धीरे॥
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                 ****हाइकु****
हाइकु सत्रह (17) वर्णों में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में 5 वर्ण दूसरी में 7 और तीसरी में 5 वर्ण रहते हैं।संयुक्त वर्ण भी एक ही वर्ण गिना जाता है, जैसे (सुगन्ध) शब्द में तीन वर्ण हैं-(सु-1, ग-1, न्ध-1)। तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात् एक ही वाक्य को 5,7,5 के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों।उदाहरण:
जन्म मरण
समय की गति के
हैं दो चरण
            वो हैं अकेले
            दूर खडे होकर
            देखें जो मेले
मेरी जवानी
कटे हुये पंखों की
एक निशानी     (नीरज)
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                       **रोला**
रोला एक छन्द है। यह मात्रिक सम छंद है। इसमें 24 मात्राएँ होती हैं, अर्थात विषम चरणों में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों में 13-13 मात्राएँ। ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्राओं पर विराम होता है। अन्त में दो 'गुरू' होने आवश्यक हैं।
कुण्डलिया छन्द दोहा और रोला का मिश्रण है।
उदाहरण
नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ =१३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ =१३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं।
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ =१३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है।
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३ मैथिलीशरण गुप्त
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                    **घनाक्षरी**
नियम:
आठ आठ तीन बार,और सात एक बार,
इकतीस अक्षरों का योग है घनाक्षरी।
सोलह-पंद्रह पर, यति का विधान मान
शान जो बढाए वो सु-योग है घनाक्षरी।
वर्ण इकतीसवां सदा ही दीर्घ लीजिएगा
काव्य का सुहावना प्रयोग है घनाक्षरी।
आदि काल से लिखा है लगभग सब ने
छंदों में तो जैसे राजभोग है घनाक्षरी॥
उदाहरण:
नैनों में अंगार भरो, कर में कटार धरो,
बढ़ चलो बेटों तुम, बैरियों को मारने।
धरती भी कहती है, गगन भी कहता है,
अब तो हवा भी जैसे, लगी है पुकारने॥
भलमानसत को वो, कमज़ोरी बूझते है,
चलो आज सारा नशा, उनका उतारने।
मनुजों के वेश में वो, दनुजों के वंशज हैं,
दौड़ पड़ो पापियों के, वंश को संहारने॥
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