1.कंपनी का कारोबार और संभावना
कंपनी के शेयरों में निवेश से पहले यह देखना जरूरी है कि कंपनी का कारोबार क्या है और भविष्य में उसकी क्या संभावना है. इसके अलावा कंपनी के पुराने प्रदर्शन पर नजर डालना जरूरी है. इनसे कंपनी की ग्रोथ की उम्मीद का अनुमान लगाया जा सकता है.उन शेयरों का पीछा न करें, जिन्होंने पहले कई गुना रिटर्न दिया है.
2. बिजनेस मॉडल में भिन्नता
कई बार कंपनी का प्रोडक्ट या बिजनेस मॉडल अलग होता. मगर यदि ये उस कंपनी के प्रतिद्वंद्वियों से मेल खाते हैं, तो जरूरी है कि इस मॉडल में कुछ नयापन या भिन्नता जरूर है. यह एक बात कंपनी को अपने प्रतिद्वंद्वियों से अलग करती है.
इसके अलावा कंपनी की बिजनेस साइकिल, विविधता आदि पर भी जोर देना जरूरी है. जियोजीत फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च प्रमुख विनोद नायर के अनुसार, विविधता से भरा कोराबार निवेश के लिए मुफीद होता है.
3. मुनाफे पर रखें नजर
कंपनी के नेट प्रॉफिट, रेवेन्यू जैसे आंकड़े निवेश का फैसला लेने से पहले जरूर जांच और समझ लें. इसके अलावा कंपनी पर दांव खेलने से पहले उसके वार्षिक और तिमाही के नतीजों पर गौर जरूर करें. शेयरों में निवेश के लिए दीर्घावधि नजरिया रखें
4. प्रबंधन की क्वालिटी को देखें
कंपनी की ग्रोथ काफी हद तक उसके प्रबंधन पर निर्भर करती है. सीमित साधनों में शानदार परिचालन उसकी योग्यता और अवसर दर्शाता है. नामी प्रबंधन पर दांव खेलने से बेहतर है कि आप प्रबंधन की कुशलता पर पैसा लगाएं.
5. कर्ज/इक्विटी अनुपात पर गौर करें
यह अनुपात बेहद अहम होता है, क्योंकि इससे यह समझने में सरलता होती है कि एक कंपनी पर शेयरधारकों की तुलना में कितना कर्ज है. यदि यह अनुपात कम होता है, तो कंपनी में निवेश का जोखिम भी कम ही माना जाता है.
6. वैल्यूएशन देख लें
वैल्यूएशन के आधार तय किया जाता है कि कोई शेयर महंगा है या सस्ता. यह पैमाना किसी शेयर की कीमतों के आकर्षण को बढ़ाता या घटाता है. कंपनियां अपनी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में ओवरवैल्यू या अंडरवैल्यू चिह्नित की जाती हैं.इसके लिए सबसे लोकप्रिय तरीक पीई (प्राइस/अर्निंग) अनुपात है. बैंकों के लिए यह थोड़ा अलग है. बैंक शेयरों के लिए पीबी (प्राइस-टु-बुक) अनुपात बेहतर माना जाता है. पूंजी आधारित कंपनियों के लिए ईवी/एबिड्टा अनुपात को तरजीह दी जाती है.
7. खुद पर रखें काबू
किसी कंपनी के बारे में किसी भी प्रकार की अच्छी या बुरी खबर से दो-चार होने पर उत्साहित या हताश होकर फैसला लेने से बचें. चोक्कालिंगम के अनुसार, सिर्फ बाजार में फैल रही बातों के आधार पर निवेश का फैसला न लें.
Debt/Equity(D/E) Ratio
डेब्ट-इक्विटी रेश्यो, रिस्क रेश्यो या गियरिंग लाभ उठाने का रेश्यो है जो कंपनी के वित्तीय लाभ उठाने का मूल्यांकन कर सकता है। इसका प्रयोग कुल शेयरधारकों की इक्विटी के खिलाफ कुल ऋण और वित्तीय देनदारियों के प्रभाव की गणना करने के लिए किया जाता है।
Debt: long term borrowing+long term liabilities+long term provision
Equity:share capital+reserve &surplus+share warrant.
Price/Earning(P/E) Ratio
P/E रेश्यो बताता है कि बाजार के खिलाड़ी कंपनी के मुनाफे के लिए प्रति शेयर कितनी कीमत देने को तैयार हैं। P/E रेश्यो को देखते समय मुनाफे में फेरबदल की आशंका पर नज़र रखनी चाहिए। शेयर बाजार के इंडेक्स का वैल्यूएशन भी P/E, P/B या डिविडेंड यील्ड रेश्यो से नापा जा सकता है।
पी ई रेश्यो क्या है - PE Ratio In Hindi:
किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उस कंपनी के शेयर का PE Ratio जानना बहुत ही जरूरी है। आम भाषा में किसी कंपनी से 100 रुपये कमाने के लिये उस कंपनी में कितने रुपये निवेश करने होंगे इसके लिये P E Ratio (Price Earning Ratio) देखा जाता है।
Price To Earning Ratio
तब निकाला जाता है जब कोई कंपनी लगातार Earning कर रही हो यानि कंपनी प्रॉफिट में हो, अगर कंपनी कमा ही नहीं पा रही है तो आप उस कंपनी का P/E Ratio भी नहीं निकाल सकते है ऐसी कंडीशन में पी ई रेश्यो Not Applicable लिखा जाता है।
किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उस कंपनी के शेयर का PE Ratio जानना बहुत ही जरूरी है। आम भाषा में किसी कंपनी से 100 रुपये कमाने के लिये उस कंपनी में कितने रुपये निवेश करने होंगे इसके लिये P E Ratio (Price Earning Ratio) देखा जाता है।
पी ई रेश्यो का महत्व
क्या किसी शेयर की कीमत भविष्य में बढ़ सकती है या नहीं, इसकी सम्भावना पता करने के लिए PE Ratio का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा एक ही इंडस्ट्री की दो अलग - अलग कंपनियों में कोनसी कंपनी निवेश के लिए सही है उसके लिए भी Price To Earning Ratio का उपयोग किया जाता है।
शेयर बाजार ने किसी कंपनी के व्यापार को कैसे आंका है इसका पता उस कंपनी के पी ई रेश्यो को देखने के बाद पता चलता है। अगर कोई कंपनी भविष्य में अपने व्यापार और मुनाफ़े को बढ़ा सकती है तो वर्तमान में उसका PE Ratio बहुत ज्यादा होगा। PE Ratio में एक ही इंडस्ट्री की दो अलग - अलग कंपनियों की तुलना की जाती है जैसे: टेलीकॉम सेक्टर की कंपनी के PE Ratio की तुलना किसी दूसरे टेलीकॉम सेक्टर की कंपनी से की जाती है। मेटल या आईटी से टेलीकॉम की तुलना नहीं कर सकते.
पी ई रेश्यो की गणना कैसे की जाती है
किसी भी कंपनी का पी ई रेश्यो निकालने के लिए दो चीज़ो की जरुरत होती है। एक उस कंपनी के शेयर की वर्तमान में मार्किट वैल्यू क्या है और दूसरा उस कंपनी का EPS (Earning Per Share) क्या है। PE Ratio को कंपनी के तिमाही नतीजों या सालाना नतीजों के बाद निकाला जा सकता है।
EPS (Earning Per Share) क्या है: मान लीजिये एक कंपनी है जिसका शेयर अभी 100 रुपये का है और उस साल कंपनी ने अपने 1 शेयर पर 20 रुपये की कमाई की है तो इस 20 रुपये को EPS कहते है। कोई कंपनी अपने 1 शेयर पर कितने रुपये कमाती है उसे Earning Per Share कहते है।
Price Earnings Ratio Formula
PE Ratio Formula= Share Market Price / EPS(Earning Per Share)
उदाहरण के लिए मान लीजिए एक कंपनी है जिसके एक शेयर की कीमत 100 रुपये है और उस कंपनी के कुल शेयर्स की संख्या 100000 (एक लाख) है। साल के अंत में कंपनी को 400000 (चार लाख) का लाभ होता है तो -
कंपनी का EPS होगा = (400000/100000)= 4 रुपये
कंपनी का PE Ratio होगा = (100/4)= 25
PE Ratio अच्छा है या बुरा यह उस कंपनी की विरोधी कंपनी के PE Ratio से मिलाकर देखने पर पता चलता है। अगर विरोधी कंपनियों के PE से ज्यादा PE है तो वह अच्छा है और विरोधी कंपनियों के PE से कम है तो वह बुरा होगा.
पी ई रेश्यो का निष्कर्ष
PE Ratio जितना ज्यादा हो उतना कंपनी के लिए सही माना जाता है लेकिन यह भी पूरा सच नहीं है। कई बार अंडर वैल्यूड स्टॉक का PE Ratio कम होता है और ओवर वैल्यूड स्टॉक का PE Ratio ज्यादा होता है। पी ई रेश्यो सिर्फ एक संकेतक है जो की यह बताता है की कंपनी ने पास्ट में कैसा परफॉर्म किया है यह कोई गारंटी नहीं है की भविष्य में भी कंपनी ऐसे ही आगे बढ़ती रहेगी। इसलिए कंपनी से जुड़े और भी फैक्टर का एनालिसिस करना जरूरी हो जाता है
i-) PE Ratio कम होने पर –
अगर किसी कंपनी का PE Ratio कम है तो इसका मतलब होता है कि या तो स्टॉक अंडर वैल्यूड है या फिर निवेशको को उस कंपनी की फ्यूचर परफॉरमेंस पर ज्यादा भरोसा नहीं है इसलिए वो लोग उस स्टॉक में निवेश नहीं कर रहे है |(PE Ratio meaning in hindi)
नोर्मल्ली लोग समझते है कि अगर कंपनी का PE Ratio कम है तो वो स्टॉक अंडर वैल्यूड ही है जो पूरी तरह से सही नहीं है | PE Ratio कम होने के पीछे और कारण भी हो सकता है जैसे कि कंपनी अच्छा परफॉर्म नहीं कर रही है जिस वजह से निवेशको को उस कंपनी के फ्यूचर परफॉरमेंस पर भोरासा नहीं है और निवेशक उस कंपनी में निवेश नहीं कर रहे है |
कई निवेशक तो उस स्टॉक में निवेश कर देते है जिस स्टॉक का PE Ratio कम होता है | वो लोग समझते है कि जिस स्टॉक का PE Ratio कम होता है उसका स्टॉक प्राइस अंडर वैल्यूड होता है |
जो कंपनिया बंद होने वाली होती है उन कंपनियों का भी PE Ratio कम होता है तो इसका ये मतलब नहीं है कि उन कंपनियों के स्टॉक सस्ते में मिल रहे है |
अगर आप PE Ratio को अच्छी तरह से समझकर अपने निवेश में इस्तेमाल करना चाहते हो तो आपको पता करना होगा कि अगर किPE Ratio कम है तो वो क्यों कम है आपको उसका कारण पता करना होगा तभी आप PE Ratio का सही तरीके से इस्तेमाल कर पायेंगे |(PE Ratio meaning in hindi)
कोई शेयर सस्ता है इसीलिए खरीदना सही नहीं है अगर आप किसी शेयर में सफल निवेश करना चाहते है तो आपको उस कम्पनी के वारे में अच्छे से एनालिसिस करना होगा |
(ii-) PE Ratio ज्यादा होने पर –
अगर किसी कंपनी का PE Ratio ज्यादा है तो इसका मतलब होता है कि या तो स्टॉक ओवर वैल्यूड है या फिर निवेशको को उस कंपनी की फ्यूचर परफॉरमेंस पर ज्यादा भरोसा है इसलिए वो लोग उस स्टॉक में निवेश कर रहे है |
नोर्मल्ली लोग समझते है कि अगर कंपनी का PE Ratio ज्यादा है तो वो स्टॉक ओवर वैल्यूड ही है जो पूरी तरह से सही नहीं है | PE Ratio ज्यादा होने के पीछे और कारण भी हो सकता है जैसे कि कंपनी अच्छा परफॉर्म कर रही है जिस वजह से निवेशको को उस कंपनी के फ्यूचर परफॉरमेंस पर भोरासा है और निवेशक उस कंपनी में निवेश करते है |
कई निवेशक तो उस स्टॉक में निवेश नहीं करते है जिस स्टॉक का PE रेश्यो ज्यादा होता है | वो लोग समझते है कि जिस स्टॉक का PE Ratio ज्यादा होता है उस स्टॉक का प्राइस ओवर वैल्यूड होता है |
बुक वैल्यू(Book Value)
अगर आसान भाषा में समझें तो बुक वैल्यू (Book value) यानी किसी कंपनी की सारी एसेट्स को बेच देते हैं और बाकी की सारी देनदारियों को चुका देते हैं तो जो पैसा बचता है उसी को हम बुक वैल्यू (Book value) कहते हैं.
बुक वैल्यू (Book value) एक शेयर की उस वैल्यू को बताता है जो शेयरहोल्डर को मिलती है. कंपनी की Book Value को Shareholders Fund या Equity भी कह सकते है.
कंपनी की Book Value Per Share खोजने के लिए पहले उस कंपनी की बुक वैल्यू पता करें. फिर उसको कंपनी के कुल जारी किए हुए शेयरों से विभाजित कर लें. इस से जो वैल्यू मिलेगी उसे Book Value Per Share कहेंगे.
मार्केट वैल्यू (Market Value)
मार्केट वैल्यू वो वैल्यू होती है जिस रेट पर शेयर ट्रेड हो रहा होता है और साथ ही मार्केट वैल्यू कंपनी के मार्केट कैपिटलाइजेशन को दर्शाता है.
प्राइस टु बुक वैल्यू क्या है?
प्राइस टु बुक वैल्यू एक ratio यानी अनुपात है, जो किसी कंपनी की Valuation (मूल्यांकन) करते समय देखा जाता है. इससे पता चलता है कि कंपनी की बुक वैल्यू के मुकाबले उसकी Market Value यानी उसके शेयर का दाम कितना महंगा या सस्ता है.
किसी कंपनी के लिए प्राइस टु बुक वैल्यू खोजने के लिए सबसे पहले उसके 1 शेयर की Market Value पता करें. जब आप किसी कंपनी के शेयर के मार्केट प्राइस को उसकी बुक वैल्यू से डिवाइड करेंगे तो हमें उस कंपनी का P/B Ratio (Price to book value ratio) मिलता है.
अब हम PB ratio को एक उदाहरण से समझते हैं ताकि आपको इसे समझने में आसानी हो. अगर एक कंपनी A2Z है जिसके शेयर का price 200 रुपये है और कंपनी की book value 100 रुपये है, तो इसमें
PB ratio= price of share / Price of Book value = 200/100 =2
इसका मतलब ये है कि शेयर की जो कीमत होनी चाहिए उससे हम 2 गुणा कीमत पर A2Z कंपनी के शेयर को खरीद रहे हैं.